इन दो खतरनाक बीमारियों से हो रही मासूमों की ज्यादा मौतें, इंसेफेलाइटिस से नहीं

इन दो खतरनाक बीमारियों से हो रही मासूमों की ज्यादा मौतें, इंसेफेलाइटिस से नहीं

गोरखपुर के बाबा राघव दास मेडिकल कॉलेज में बीते चार दशकों से इंसेफेलाइटिस बच्चों पर

कहर बरपा रहा है और इस जानलेवा बीमारी से बचाव के सभी उपाय नाकाफी साबित हो रहे हैं.

सवाल यह है कि गोरखपुर और इसके आसपास के जिलों में इंसेफ्लाइटिस का आतंक कब खत्म होगा?

कैंपेनर इंसेफेलाइटिस उन्मूलन अभियान डॉ आरएन सिंह से इस बाबत पूछा तो उन्होंने बताया कि

एईएस से तीन प्रकार की बीमारयां होती हैं. जापानी इंसेफेलाइटिस, एंट्रोवायरल और स्क्रबटाईफस.

इसमें से जापानी इंसेफेलाइटिस की वैक्सीन उपलब्ध है और स्क्रबटाईफस की दवा उपलब्ध है,

इस बीमारी का अभी शोध ही किया जा रहा है. लेकिन एंट्रोवायरल का कोई इलाज नहीं है.

एंट्रोवायरल गंदे पानी के पीने के कारण होता है.

इन दो बीमारियों से हो रही हैं मौतें

एंट्रोवायरल और स्क्रबटाईफस ये दो ऐसी बीमारियां है जिसकी चपेट में आने से सबसे

ज्यादा बच्चों की मौतें हो रही हैं. इस बीमारी को रोकने के लिए सबसे ज्यादा जरुरी है कि हर

घर में शौचालयों का निर्माण हो, वहीं जल और मल के मिश्रण को तत्काल रोका जाए.

तभी इस बीमारी को जड़ से खत्म किया जा सकता है.

बच्चों की मौत के अंकड़ों पर बोलते हुए डॉ. आरएन सिंह ने बताया कि नवजात बच्चों के

अंदर इंसेफेलाइटिस नहीं पाई जाती है. 0-1.5 साल के जो भी नवजात बच्चे होते हैं उनकी

मौत जापानी इंसेफेलाइटिस से नहीं होती है. डाॅ. सिंह कहते हैं कि हम पोलियो मुक्त भारत

बना सकते हैं तो इंसेफेलाइटिस मुक्त पूर्वांचल क्यों नहीं बना सकते?

एनआइवी पुणे कर रही हैं शोध

मेडिकल कॉलेज परिसर में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी्य (एनआइवी), पुणे की एक

शाखा इस पर शोध कर रही है. यहां प्रयोगशाला जांच में वातावरण और गंदगी में पाए जाने

वाले एंट्रोवायरस, स्क्रब टाइफस, रुबेला वायरस, हरपीज सिंप्लेक्स वायरस, वेरीसोला जोस्टर

वायरस समेत कुल 137 प्रकार के कारकों की पहचान की गई है जो शरीर में प्रवेश कर

दिमाग की झिल्ली में सूजन करते हैं जिसे एईएस कहा जाता है.

बीमारी फैलने की मुख्य वजह गंदगी

बीआरडी मेडिकल कॉलेज गोरखपुर के पूर्व प्रिसिंपल और वरिष्ठ बाल रोग विशेषज्ञ

डॉ. केपी कुशवाहा ने बताया कि जलजनित इंसेफेलाइटिस से बचने के लिए जरूरी है

कि पीने का पानी शुद्ध हो और पेयजल स्रोत का किसी भी तरह से शौचालयों, नाले या

गंदे पानी से सम्पर्क न हो. कम गहराई वाले हैंडपम्प आस-पास बने शौचालय,

नाले या गन्दे पानी से भरे गड्ढों से दूषित हो सकते हैं.

इसलिए लोग गहराई वाले (80 फीट से अधिक) वाले हैंडपम्प के ही पानी का प्रयोग करें.

सरकारी इंडिया मार्का हैण्डपम्प के पानी के प्रदूषित होने की आशंका कम रहती है.

मेडिकल काॅलेज के वर्तमान प्रिसिंपल डाॅ.पीके सिंह ने बताया कि जापानी इंसेफेलाइटिस की

वैक्सीनेशन से बच्चों की मौतें अब पहले के मुकाबले कम हो गई हैं. एनआइवी पुणे इस पर

और इंटेंसिव शोध कर रही है. जल्द ही कुछ कारगर नतीजे सामने आएंगे.

बाबा राघवदास मेडिकल कॉलेज में दिमागी बुखार के मरीजों के लिए बना 100 बिस्तरों वाला

इंटेंसिव केयर यूनिट (आइसीयू) वार्ड बच्चों के आगे छोटा पड़ गया है. एक बिस्तर पर लेटे

दो-दो बच्चे जिंदगी की जंग लड़ रहे हैं. इससे संक्रमण फैलने की संभावना ज्यादा प्रबल हो ती है.

क्या हैं बीमारी के लक्षण

इस बीमारी में रोगी को सिर दर्द के होता है वह बुखार होता है. इसके अलावा इसका कोई

प्रत्यक्ष लक्षण नहीं होता. कुछ छोटे बच्चों में गर्दन में अकड़न, कंपकंपी, शरीर में ऐंठन जैसे लक्षण होते हैं.

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