NEW YEAR 2018: क्‍यों खुद से किया वादा नहीं निभा पाते हैं

वादे तो होते ही तोड़ने के लिए हैं – यह किस ने कहा है पता नहीं, लेकिन जिसने भी कहा है सच को

देखते हुए कहा है. वैसे तो नए साल का स्वागत करने के लिए वादा करना अनिवार्य नहीं है लेकिन

फिर भी हम यह काम करते हैं. कभी खुलेआम तो कभी मन ही मन अपने आप से कहते हैं कि

इस साल यह काम नहीं करूंगी/ करूंगा. इस साल सुबह जल्दी उठेंगे, सिगरेट नहीं पीएंगे,

मोबाइल ज्यादा नहीं देखेंगे. लेकिन साल की पहली तारीख जितनी जल्दी गुज़रती है, यह वादे

भी दिमाग से उतनी ही जल्दी निकल जाते हैं. हालांकि वादा खिलाफों के बीच ऐसे लोग भी हैं

जो जनवरी नहीं, किसी भी महीने में किए गए वादे को पूरा करते हैं.

मनोविज्ञान कहता है कि वादा पूरा करने की पहली शर्त तो यह है कि वादा कितना रियल है.

लफ्फाज़ी या मज़ाक में किए गए वादों को गंभीरता से लेने की गलती कोई नहीं करता. लेकिन अगर कसम

सचमुच की खाई गई है, और आप वाकई उस पर अमल करना चाहते हैं, तो अव्वल तो वो व्यावहारिक होनी चाहिए.

दूसरी बात पूरी योजना के साथ उसे अमली जामा पहनाया जाए. कल से सिगरेट नहीं पीऊंगा, कह देने भर

से नहीं चलेगा. उसके साथ ही खुद को यह जवाब भी देना होगा कि अगर इस बीच सिगरेट पीने का मन हुआ

तो  खुद को कैसे काबू में करेंगे. किसी दोस्त ने पीने के लिए उकसा दिया तो उसे कैसे हैंडल करेंगे, वगैरह वगैरह.

वादों के मनोविज्ञान को लेकर छपी एक बीबीसी रिपोर्ट में बताया गया कि उन वादों के पूरा होने की

संभावना ज्यादा है जिसमें कोई दूसरा जुड़ा हो. यानि जिस वादे में आपके अलावा किसी अन्य व्यक्ति की सेहत,

पैसा या वक्त लगा हुआ है, उसे तोड़ने से पहले आप दस बार सोचेंगे.मसलन मम्मी की सेहत के लिए सुबह जल्दी उठना और उनके साथ सैर पर जाना. या फिर दोस्त के साथ

किसी डांस क्लास का हिस्सा बनना हो जिसके लिए फीस चुका दी गई है. ऐसे में आप पर उस वादे को पूरा

करने का एक अनचाहा दबाव होता है और प्रेशर में ही सही आप उसे पूरा करते चलते हैं.

इसी के तहत यह भी बताया गया था कि आमतौर पर मनुष्य को नुकसान की भरपाई करना ज्यादा

प्रोत्साहित करता है. जैसे की पेंटिंग की पुरानी आदत जो छूट गई थी लेकिन अब आप उसे फिर से शुरू

करना चाहते हैं. यह किसी नई आदत को अपनाने से ज्यादा आसान काम हो सकता है.

इन तमाम बातों के बीच सबसे जरूरी पहलू यह है कि आप खुद वादा पूरा करने को

लेकर कितने गंभीर हैं. हो सकता है कि दूसरों से किए वादे आप पूरे कर लेते हो, लेकिन

जब खुद की बारी आए तो बात न बन पाए.

ऐसे में दिमाग पर ज्यादा लोड न लें और खुद के लिए उस लाइन को दोहराएं जो हमने सबसे ऊपर लिखी है.

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